स्वामी रामतीर्थ अमेरिका की यात्रा से लौटते समय मिस्त्र मैं रुके….राजधानी कायरो की बङी मस्जिद मैं उनके भाषण की व्यवस्था की गई.वहां उन्होने शुद्ध फारसी मैं भाषण देकर मिस्त्र वासियों का दिल उन्होने जीत लिये….मस्जिद की बङी बङी मीनारें देखकर उनके मन मैं विचार उठे जिन्हें उन्होने कविता मैं निबद्ध किया….
मिसर की खोद ले जो मीनार ,हाये..मुर्दों भरी वह मीनार
ममी मुर्दे उन्ही मैं रखे थे,ऐसी तरकीबों-अक्लमंदी से।।
गो हजारों बरस भी हों बीते,मुर्दे नजर आते जूं जीते।
प्यारे भारत के हिंदु बाशिंदो,गुस्सा मत करना जाहिदों(कर्मकांडी) रिंदो।(मस्त)
जी रहे हो कि मर गये हो तुम ,ममी मीनार बन गये हो तुम।
जीते तमु थे ऋषि-मुनि थे जब,ममी क्यों हो हजार साल के अब।
क्यों हो जिंदा बदस्ते(मुर्दे के समान) मुर्दा आप, नाम रोशन डुबोया उनका आप।
वह तो जीते थे तुम भी जी उठो,मुर्दा बच्चे न उनके हो बैठो।
नाम तो ले रहे व्यास का तुम,काम करते हो अदना दास का तुम।
छोङ दो नाम लेना ऋणियों का ,खुद ऋषि हो अगर न अब बनना ।
बढ़िया प्रस्तुति !
प्रत्युत्तर देंहटाएंस्वामी रामतीर्थ के बारे में पढ़ने को मिला - साधुवाद .
प्रत्युत्तर देंहटाएंनाम तो ले रहे व्यास का तुम,काम करते हो अदना दास का तुम।....... बहुत सही कहा गया है |
प्रत्युत्तर देंहटाएंक्या वाकई में हिन्दू जीवित लगते हैं....
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